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सोमवार, 1 जून 2009

बंधक कलमें


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


यह आलेख २३ मई को जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था , लोकसभा चुनावों का एक अनुभव आपके साथ बांटना चाहता हूं......


भूपेश कोई तीसेक साल का है, उससे मुलाकात पिछले दिनों इलाहाबाद में एक प्रत्याशी के चुनाव प्रबंधन करने के दौरान हुई। पहली मुलाकात में भूपेश ने अपने सरल स्वाभाव और स्पष्टवादिता से ये साफ किया कि उसकी लिखी खबरों में पक्षपात देखने को नहीं मिलेगा। मन को एक राहत मिली क्योंकि उस समय मेरे फोन पर अखबारों के दफ्तर से सिर्फ धमकी भरे फोन आ रहे थे, "पैकेज ले लिजिए क्योकि चुनाव मीडिया ही जितवाता है और मीडिया ही हरवाता है, बाकि आप खुद ही समझदार है।"
इस बार के चुनाव में शब्दों की जो मंडी लगी थी, उसमें सबके अपने अपने दाम थे, इस मंडी में शब्दों को बेचने वाली तथाकथित पत्रकारों की कौम के रवैये को देखकर जितना दुख हुआ , उससे कहीं ज्यादा हैरत इस बात पर हुई कि इस हमाम में आकंठ डूबे नंगो के बीच में एक व्यक्ति भूपेश भी है जो अभी भी पत्रकारिता पर विश्वास बनाने का प्रयास कर रहा है, समाज के प्रति जिम्मेदारी का एहसास उसकी आंखों में नजर आ रहा था। मैं इलाहाबाद इस उद्देश्य से गया था कि मीडिया जिस तरह से वेश्या से भी गिरी हुई स्थिति में आकर अपना ईमान बेच रहा है ,उसमें कहीं ऐसा ना हो कि पैसों की कमी की वजह से हमारे प्रत्याशी के बारे नकारात्मक खबरे छपने लगें। इसे रोकने के लिए तथाकथित पत्रकारों को हमारे द्वारा दिए जा रहे मंहगे उपहार को लेने से भूपेश ने ना केवल दृढ़ता से मना कर दिया, उल्टे हमें सलाह दी कि हम मीडिया को तोहफे देने के बजाए गांवों में जाकर लोगो से समर्थन मांगे। भूपेश की यह ना एक तमाचे की तरह थी,यह तमाचा उन पर था जो पत्रकारों को एक दलाल से ज्यादा कुछ नहीं समझते, यह तमाचा उस व्यवस्था पर था जो मानती है कि सबकुछ मैनेज हो सकता है और उन अखबार, चैनल मालिको पर भी था, जो मानकर चलते है कि पत्रकार मुफ्तखोर होता है इसलिए उसे कम वेतन दिया जाना चाहिए, यह तमाचा उन उम्मीदवारों के मूंह पर भी था जिन्होने पैसा फेंक कर पूरे अखबार को ही खरीद लिया था और कहीं ना कहीं यह तमाचा मेरे मूंह पर भी लगा था।
इलाहाबाद में अखबार सच नहीं लिख रहे थे बल्कि सच की रचना कर रहे थे, सभी पर सच की रचना करने और संस्थान की आय बढ़ाने का दवाब था। भूपेश द्वारा लिखी जा रही खबरों से लगातार हमारा नुकसान हो रहा था, लेकिन मै जानता था कि वह सच लिख रहा है, प्रत्याशी का करीबी होने के कारण हमारी कोशिश थी कि वह हमारे पक्ष में लिखे, लेकिन ऐसा ना होने पर मेरे अंदर का पत्रकार खुद को जीवित महसूस कर रहा था। पत्रकारिता की अमरता का एहसास कराता भूपेश की खबरों का उजाला, मैं अपने अंदर महसूस कर पा रहा था।
बचपन में, मेरे गांव सिहावल में एक ही अखबार आता था, गांव में बने एक सहकारी भवन , ब्लाक में आने वाला यह अखबार दोपहर तक ही गांव तक पहूंच पाता था, चाचा और उनके दोस्त इंतजार करते रहते, सबसे पहले खबरें वे ही पढते और शाम होते होते पूरे गांव में उस अखबार की खबरें पहूंच जाती, कभी मन में यह ख्याल भी नहीं आया कि इसमें कुछ गलत लिखा भी जा सकता है, वह अखबार एकमात्र जरिया था, गांव के बाहर की दुनियां को जानने समझने का, कुल मिलाकर हमारे लिए उस अखबार का लिखा, भगवान के लिखे से कम नहीं होता था। तब से अब तक बीस साल हो गये इतने सालों में मीडिया में सच्चाई के साथ संवेदनाओं के सरोकार पूरी तरह बदल गए है, सुना है जब इंदिरा गांधी के दौर में इमरजेंसी लगी थी, उस समय कई अखबारों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रोके जाने के विरोध स्वरूप अपने अखबारों के संपादकीय पृष्ठ को काला करके छापा था, आज तो अखबारों ने अपने ही मुंह पर कालिख पोत ली है और सबसे खास बात .ये है कि अपने कालेपन पर इतराते ये लोग अब इस बात पर प्रतियोगिता लगा रहे हैं कि मेरे से तेरा रंग काला कैसे ? हिन्दी पट्टी में समाज का बहुत बड़ा वर्ग पत्रकारों में भरोसे का, एक अभिभावक का चेहरा देखता है, इस आम आदमी की हालत उस बच्चे की तरह है, जिसने अभी अभी चलने की शुरूआत की है वो अपना शरीर अपने पालक को सौंप देता है, उसे ये विश्वास होता है कि अगर मैं गिरूंगा तो कोई होगा जो मुझे थाम लेगा, लेकिन वो बेचारा आज भी नहीं जानता कि उसकी ओर बढ़ने वाले विश्वास के हाथों पर तो ना जाने कब से सोने की बेडि़यां पड़ गई हैं।
कु्ल मिलाकर इस बाजार में हर चीज बिक रही थी ख़बर, संपादकीय, और ख़बर के खॉचे में विज्ञापन, या फिर आपकी जीत पक्की करने के दावें करने वाले बड़े - बड़े बयान, सब कुछ उपलब्ध था। चुनाव लड़ने वाले हर प्रत्याशी पर इस बाजार से कुछ ना कुछ खऱीदने का दवाब था।सूचना के अधिकार और उससे बढ़कर आम आदमी के विश्वास की धज्जिया उड़ाते ये अखबार बेशर्मी के साथ पैसा लेकर सभी को जीतता दिखा रहे थे। ऐसे में एक दिन भूपेश का फोन आया, बेहद भर्राई हुई आवाज में उसने कहा सर हो सके तो जो विज्ञापन आप औरो को दे वह हमें भी दे, हमारी और कोई डिमांड नहीं है, मैने सहर्ष स्वीकृति दे दी किन्तु उसकी आवाज में छिपी बेबसी का दर्द मुझे समझ में आ रहा था। उसकी बेबसी ने मुझे किसी शायर की ये पंक्तियां याद दिला दी थी कि- तुम्हारे पास सरकार है हम इसलिए चुप हैं, हमारे पास घरबार है हम इसलिए चुप हैं।
अभय मिश्र
9871765552

बुधवार, 20 मई 2009

भरोसे की कीमत पर..




पत्रकारिता के क्षेत्र में राजेश कटियार की धमक और दखल नया नहीं है, मीडिया को अक्सर आईना दिखाने वाले राजेश जी का यह लेख कुछ दिन पहले जनसत्ता में छपा है। मीडिया की मंडी में बिक रहे और सूचना के अधिकार का अपहरण कर रहे अखबारों और चैनलों की हालात को उन्होने एक त्रासदी के रुप में बयान किया और चेताया भी है........



सूचना क्रांति के दौर में भी सही खबर का अभाव किसी त्रासदी से कम नही है। ताजा लोकसभा चुनावों में इसका प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है। एक दशक पहले जब आज की तरह सूचना क्रांति का बोलबाला नहीं था तब अखबारों पर भरोसा था और अखबारों का खबर पर भरोसा था। अनेक स्थानों पर खबर की रफ्तार सुस्त थी। लेकिन देर से ही सही जानकारी सटीक मिलती थी। तब चुनावी विश्लेषणों से काफी हद तक यह संकेत मिल जाता था कि चुनावी हवा का रूख किस दिशा में है। चुनाव नतीजों के बाद अधिकतर अखबारों की खबर होती थी कि अनुमान के मुताबिक ही नतीजे मतदान पेटियों से निकले। अखबारों का अपना आकलन, सपाट रिपोर्टिंग और सपाट नतीजे। राज्यों के चुनावों में भी कमोवेश ऐसा ही आकलन होता था।

लेकिन अब ऐसा नहीं हैं। मतपेटियों का स्थान इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन ने लिया है। वहीं प्रचार का काम पोस्टर, दीवान लेखन व ध्वनि प्रचार के स्थान पर अखबारों ने संभाल लिया है। लेकिन प्रचार के इस तरीके के तहत अखबारों में चुनावी खबरों ने विज्ञापन का रूप ले लिया है। उत्तर प्रदेश में चुनावी जायजा लेते हुए राज्य के एक प्रमुख अखबार को पढ़ते हुए उसकी एक खबर पर नजर पड़ी कि ‘मीडिया के घोड़े भी चुनावी मैदान में’। यह खबर चौंकाने वाली थी, इसलिए उसे ध्यान से पढ़ा। उसका सारांश था कि कुछ अखबारों ने चुनावी समर में अपनी बोली लगा ली है। लोकतंत्र के लिहाज से देश के सबसे धनी इस राज्य के बड़े अखबार घराने भी बोली लगाने वालों में हैं। यह कोई नहीं बल्कि राज्य का ही तीसरा अखबार बता रहा है। चुनावी बिगुल बजते ही इन अखबारों ने बाकायदा अपना पैकेज प्रिंट कर हरेक पार्टी के उम्मीदवारों या उनके प्रबंधकों से संपर्क साधा। एक अखबार की चुनावी नीति है कि वह तय पैकेज में उम्मीदवार की हरेक खबर को विज्ञापन रेट पर छापेगा। जिससे उसकी बात नहीं बनी, पूरे चुनाव में उसकी एक भी खबर नहीं छपी। उसके प्रचार में कोई राष्ट्रीय नेता गया तो संबंधित खबर अंदर कहीं सिंगल कालम में देकर अपना फर्ज अदा कर लिया। दूसरे अखबार का एक मुश्त रकम पर प्रचार के दरम्यान दो टेबलायड, विज्ञापन के साथ प्रमुख खबरों का पैकेज था। दरअसल, उम्मीदवार इस गुमान में रहते हैं कि मीडिया ही हवा बनाता है, उन्होंने सौदा कर लिया। उनकी पार्टियां गौड़ हैं। जो सौदा नहीं करते, वह सार्वजनिक रूप से अखबारों पर बिकने के आरोप लगा रहे हैं।

दिलचस्प है कि यही अखबार में अपने अखबार में चुनाव में मतदान के लिए नियमित जन जागरण अभियान भी चला रहे हैं। उनका यह प्रयास शायद यह बताने के लिए है कि हमारे पास वोट डलवाने की की ताकत है। उसकी कीमत है। लेकिन यह इतनी ज्यादा है कि हर उम्मीदवार दांव नहीं लगा सकता। इसलिए कई उम्मीदवारों ने इस समस्या पर चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया। कुछ ने प्रेस काउंसिल में शिकायत दर्ज कराई। कई ने अपनी चुनावी सभाओं में अखबारों पर बिकने का आरोप मढ़ा। लेकिन अनुभव में यही आया कि कोई संस्था इस पर पहल नहीं कर पाई। प्रचार के बदले तरीके में अखबारों को अपनी भूमिका समझनी चाहिए। उनके विज्ञापन लेने पर कोई मनाही नहीं है। लेकिन विज्ञापन को विज्ञापन की तरह होना चाहिए। खबर विज्ञापन के रेट पर छपे और नीचे कहीं किसी ऐजेंसी का जिक्र न हो तब यह भ्रम होता है कि वह अखबार की अपनी खबर है। लेकिन वह है विज्ञापन जिसका अखबार ने रेट तय किया है। उम्मीदवार की तरफ जो खबर आती है, उसे उसी रूप में विज्ञापन रेट पर छाप दिया जाता है। दरअसल, यह उन पाठकों के प्रति बेईमानी है जो अखबार खरीदते हैं। खबरों को वह सच मानते हैं। उन पर धारणा-अवधारणा बनकर चर्चा होती है। लोकत्रंत के लिए यह बेहद जरूरी है। लेकिन जब खबरों को पेश करने का तरीके से मालूम ही न पड़े कि वह खबर है या विज्ञापन, तब यह एक गंभीर सवाल है। अपनी बोली लगाकर अखबारों ने खबर और विज्ञापन का फर्क मिटा दिया है। ध्यान रखने की बात है कि अखबार एक दस्तावेज होता है जिसे कितने ही पाठक सहज कर रखते हैं। इसीलिए यह माध्यम खबरिया चैनलों से सशक्त है। चैनलों की खबरों की तुलना में अखबार की खबरों की उम्र कहीं ज्यादा होती है।

ध्यान रखना चाहिए कि मीडिया के प्रचार से सरकार बनती और बिगड़ती नहीं है। ऐसा होता था तो पिछले लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में राजग का शासन होना चाहिए था। मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री नहीं बनती। मध्य प्रदेश में छह साल पहले दिग्विजय सिंह की सरकार नहीं उखड़ती। खबरों के अनुमान से उलटा हुआ। मायावती को उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत मिला। उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में हरेक अखबार का दावा था कि लटकी विधानसभा होगी। चुनाव के एन वक्त एक गंभीर चैनल का सर्वे था कि उत्तर प्रदेश में भाजपा नंबर एक पर है। लेकिन यह सर्वे एक सोच-समझा खेल था। इसका मकसद था कि ऐसे सर्वे से उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों को वोट उस दल को थोक भाव में मिल जाएगा जिसने उसके सहारे राज्य की राजनीति में पैर पसार रखे हैं। इतना खेल होने के बाद भी मायावती ने बिना किसी प्रचार के अपने दम पर राज्य की राजनीति की धुरी बन गईं। चुनाव के नतीजों ने सबकी पोल खोल दी। दरअसल समाचार माध्यमों को जमीन सूंघने की फुर्सत नहीं है। इसलिए प्रचार के मामले में संबंधित संस्थाओं को गंभीर होना चाहिए। साथ ही पार्टियों को ध्यान रखना चाहिए कि उसने अपनी खबर खरीद तो नहीं ली हैं। चुनाव लोकतंत्र का पहिया है। इसकी धुरी में विज्ञापन के रेट पर खबरों का तेल नहीं डाला जाना चाहिए। ऐसा होगा तो नतीजे अनुमान के मुताबिक नहीं निकलेंगे और जगहंसाई अलग होगी।

गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

ना कागज़ की कश्ती, ना बारिश का पानी




मुबंई हमलों से ध्यान बटाने के सरकारी प्रयास शुरु हो चुके है, पहली कोशिश महाराष्ट्र सरकार ने की है। राज्य सरकार के श्रम मंत्रालय ने बालिका वधु, कृष्णा, उतरन जैसे कई सीरियलों को बच्चों से ज्यादा काम करवाने को लेकर नोटिस जारी किया है। महाराष्ट्र में बाल श्रमिकों की अच्छी खासी तादात है लेकिन मीडिया मोह के चलते सरकार को सेलीब्रिटी बच्चे ही नजर आए। लेकिन यहां हम महाराष्ट्र सरकार के इस नोटिस के बहाने बात करने की कोशिश कर रहे है कि किस तरह बाजार ने बचपन पर कब्जा कर लिया है। मां बाप इस बाजार के शिकार है, सबको अपना बच्चा नम्बर वन ही चाहिए टू नहीं। मेरा यह लेख जनसत्ता में 22 अक्टूबर को प्रकाशित हुआ था। इस नोटिस की आड़ में फिर आपसे सांझा कर रहा हूं।



टीवी पर मुंबई वर्ली से मटकी फोड़ का सीधा प्रसारण चल रहा था। गोविंदाओं ने घेरे बनाकर पिरामिड तैयार कर लिया था अंत में एक छोटे से बच्चे को कृष्ण का रुप धर सबसे ऊपर चढाने की कोशिश की जा रही थी। इतनी भी़ड़ हो हल्ला और ऊचाई देखकर बच्चा डर गया और जार जार रोने लगा। वहां मौजूद लाखों लोग वैसे ही उस तमाशे को देख रहे थे जैसे हम घर में बैठकर टीवी पर। टीवी कैमरा उस बच्चे पर फोकस किये हुए थे। सभी तमाशे का मजा ले रहे थे।हर कोई चाह रहा था बाल कृष्ण ऊपर तक पहुंच कर उन्हे दर्शन दे। चारों तरफ चीख चिल्लाहट का माहौल, कानफोड़ू माहौल में रिपोर्टर चीख-चीख कर ताज़ा जानकारी देने की कोशिश कर रही थी। इस मटकी फोड़ प्रतियोगिता में शामिल लोगो का घ्यान बच्चे से ज्यादा वहां लगे कारपोरेट बैनरों पर था जिन पर ईनाम की राशि लिखी थी। यही तो वो खास चीज थी जिसने बच्चे को इतनी ऊंचाई पर पहुंचा दिया था, मां बाप की इच्छा थी कि उनका बेटा और ऊंचा जाए, बच्चे को ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए उन्हें थोड़ी कुर्बानी तो देनी ही है, इसलिए वो बच्चे को रोने पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे। इसी बीच ब्रेक हो गया विज्ञापन आ रहा था - मां और दादी छोटे बच्चे को बोलना सीखा रहे है - मां बोल बैठा मां , कुछ देर बाद बच्चा मां के बजाए मनी कहता है यह विज्ञापन किसी वित्तीय फर्म का था। दूसरा विज्ञापन एक टूथपेस्ट का था जिसमें बच्चों से टीवी पर आने के लिए फोटो भेजने के लिए कहा जा रहा था। सोचने पर मजबूर हो गया कि बाज़ार ने बचपन को कैद कर लिया। हर चीज बाजार निर्धारित करने लगा है और बच्चों को बाजार चारे के रुप में इस्तेमाल कर रहा है।

आफिस जाने के लिए घर से बाहर निकला तो यही नजारा पास के स्कूल में देखने को मिला। जनमाष्टमी पर आयोजित कार्यक्रम में छोटे -छोटे बच्चों को कान्हा राधा बनाकर लाया गया था। हर अभिभावक चाहते थे कि उनका बच्चा ही वह तथाकथित विचित्र परिधान प्रतियोगिता जीते, उन्हे इस बात की जरा भी परवाह नहीं थी कि राधा बनी उनकी चार साल की बिटिया उस परिधान को संभाल भी नहीं पा रही। कोई बच्चा रो रहा है तो किसी द्वारिकाधीश का मुकूट उनकी आंखो पर आ रहा है। और अभिभावक उन्हे डांटकर यशोदा का नंदलाला बने रहने पर मजबूर कर रहे थे। कुल मिलाकर चारों ओर बाजारियत अभिभावको के सर चढ़कर बोल रही है। हालिया फिल्म तारे जमीन पर का तात्पर्य लोगो ने यह लगा लिया है कि हमारे बच्चो इस तेजी से बढ़ते प्रतियोगी समाज में हर हाल में तारे की तरह चमकना होगा।

हाल ही में एक रियल्टी शो में जजों ने एक प्रतियोगी बच्चे को इतनी जोर से ड़ांटा कि वह अपना होश ही खो बैठी। हर घर में बच्चे को दौड़ में आगे रहने के लिए डांटा फटकारा जा रहा है। मेरे परिचित का बेटा पढ़ाई लिखाई में औसत से भी नीचे है लेकिन नई कारों और मोबाईल के बारे में उसकी जानकारी गजब की है यह बाजार का असर ही है कि बच्चे अपनी स्वाभाविक ग्रोथ खोते जा रहे है।

गुजरात के नामी शिक्षाविद गिजुभाई वधेका ने खत्म होते इस बचपन को बहुत पहले पहचान कर बाल शिक्षा की अपनी किताब दिवास्वप्न में शांति का खेल खेलते हुए बताया कि ऊं शांति कह देने से ही बच्चे ध्यान करने नहीं बैठ जाते उनके अंदर जो ढेर सारी उर्जा होती है उसे वे खेल कूद कर, आपस में मस्ती कर निकालते है और यही से उनके स्वाभाविक विकास का मार्ग तय होता है।

बचपन में कभी भी पापा के द्वारा मारे गए उस झापड़ का बूरा नहीं लगा जो उन्होने हमेशा मेरी जेब में कंचे और चिये भरे रहने की वजह से मारा था। कभी पड़ोसी अंकल की खिड़की गिल्ली से तोड़ी तो उनकी डांट को भरपूर मजा भी उठाया। कंधो पर बस्ते के बोझ उठाता आज का बचपन शायद ये भूल गया कि आखिर मौज-मस्ती किस बला का नाम होता है। वीडियो गेम में आंखे गड़ाते बचपन शायद वो काग़ज की किश्ती और बारिश के पानी का आनंद उठाना जानता ही नहीं है, क्योंकि मां-बाप अपने लाड़ले में संस्कार डालना चाहते हैं और आज के संस्कार कहते हैं कि कंचे खेलता बचपन हल्का बचपन है, इसमें विकास जैसी कोई बात नहीं है, इससे भला तो ये है कि घर में बैठ कर इंटरनेट पर नज़र जमाओ, अपना होमवर्क करो, खाना खाओ और सो जाओ। हंसता बचपन, धूल मिट्टी से सना हुआ बचपन सिर्फ परेशानियों से घिरा हुआ हो गया है, लेकिन मेरी साड़ी से तेरी साड़ी सफेद कैसे ? के इस दौर में मां बाप भूल जाते हैं कि शिखर पर हमेशा एक ही होता है, जिसका ये कदापि मतलब नहीं है कि बाकि सब कुछ बेकार है। बाजार के इस प्रभाव से बाल सरंक्षण आयोग नहीं बच पाया है कुछ दिन पहले आयोग ने तय किया कि कामकाजी बच्चों के काम करने के घंटो की जांच की जाए,इस जांच के लिए आयोग ने रियल्टी शो और टीवी सीरियल मे काम करने वाले सिलीब्रेटी बच्चों को ही चुना, होटलो,ढाबो पटाखा चूड़ी कालीन कारखानों में काम करने वाले बच्चे आयोग को नजर नहीं आए।

मानिये या नामानिये पर हमारी पीडी का बचपन असल में बचपन था आज तो मां बाप बचपन को खत्म करने के लिए बचपना करने पर ऊतारु है। बचपन में किए गए कई कारनामें आज भी याद आते है चाहे पतंग उड़ाना हो या बेरी तोड्ने के लिए दूर तक जंगल में भटकना या फिर हॉकी के आकार की झाड़ी काटकर उससे हॉकी खेलना। हमेशा कामिक्स में डूबे रहना। जावेद अख्तर की लिखी लाइने"जब मेरे बचपन के दिन थे चांद में परिया रहती थी"आज के बचपन से मेल नहीं खाती पांचवी कक्षा किताब इस बहस से भरी पडी है कि चांद में जीवन की गुंजाईश है या नहीं । बाल कल्पनाओ को बाजार अपनी सुविधा से तोड़ मरोड़ रहा है। आज का बाजार उदय प्रकाश की कहानी अरेबा परेबा के उस बिलौटे की तरह है जो खरगोशो को खाकर एक नई कहानी गढ़ देता है कि खरगोशो को एलियंस ने पत्थर में बदल दिया। और बाल मन के पास बाजार की इस कहानी पर विश्वास करने के अलावा कोई चारा नहीं है।दरअसल आगे बढ़ाने की होड़ में बचपना कहीं पीछे छूट गया है, निदा फाजली जी ने शायद भविष्य देखकर ही ये बात लिखी होगी, बच्चों के नन्हे हाथों को चांद सितारे छूने दो, दो चार किताबे पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जाएंगे।