कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 29 मई 2009

पंकज रामेंदू की दो कविताएँ



काश ऐसा होता !


काश ऐसा होता
कि जिंदगी की उलझनें,
महबूबा की जुल्फों की तरह होती,
जिनमें जब प्रेमी अपने
बेबस, झिझकते हुए हाथों को डालता है
तो वो खुद-ब-खुद
सुलझने को राज़ी हो जाती हैं,
औऱ ये उलझन
एक अजीब सा आंनंद देती है
एक ऐसी उलझन,
जिसे बार-बार सुलझाने का मन करता

काश ऐसा होता !
कि जिंदगी की उलझनें,
पंतग के मांजे की तरह होतीं,
जिसके दोनों सिरों को पकड़
नादान बच्चा भी उन्हें सुलझा लेता है,
और वो उलझने,
उस मासूम बच्चे के इशारों पर ,
ऐसे खुल जाती हैं
जैसे हवा के झोंके से,
खिड़की का पल्ला खुल जाता है।

काश ऐसा होता !
कि वक्त रूठता तो इस तरह
जैसे कोई बच्चा अपनी मां से रूठ जाता है,
जिसके रूठ कर बात ना करने में भी,
एक अनोखा सा आनंद आता है,
जिसे मनाने की जद्दोज़हद
हमें भाव-विभोर कर देती है
जिसका रुठना हमें मनोरंजित करता,
काश ऐसा होता !

---------------------------------------


एक सवाल

हर बार सोचता हूं कि

जिंदगी जब एक रूपया हो जायेगी,

तो बारह आने खर्च कर डालूँगा

औऱ चाराने बचा लूंगा,

कभी ज़रूरत पड़े,तो

इन चारानों से बारानों का मज़ा ले सकूं,

लेकिन जब भी वक्त की मुट्ठी खुलती है

तो हथेली पर चाराने ही नज़र आते हैं

पूरी जिंदगी चाराने को बाराने बनाने में

होम हो जाती है,

कई बार लगता है कि जब ये रुपया हो जायेगी

तो क्या जिंदगी, जिंदगी रह जाएगी ?

शनिवार, 20 दिसंबर 2008

एक ख़बर न्यूज़ रूम से



आपने पशुपति जी को पढ़ा, यूं ही ब्लाग की दुनियां में घूमते हुए उनके "खोयाचांद" ब्लाग पर यह कविता थी। यह सिर्फ कविता ही नहीं, मीडिया से जुड़े हर शक्स की आपबीती सी लगती है। पिछले साल लिखी गई इन लाइनों में घटना भले पुरानी हो, मर्म बारहमासी है। पशुपति जी वॉयस आफ इंडिया से जुड़े हैं।


किरण बेदी नाराज़ है
ख़बर आयी और न्यूज़ रूम में मच गयी हलचल
बॉस ने कहा - तान दो ख़बर
ख़बर तन गयी ...
बेदी नाराज़ हैं कि
उन्हें दिल्ली पुलिस प्रमुख नहीं बनाया गया
बेदी नाराज़ हैं कि
उनकी जगह किसी जूनियर को दिया गया प्रमोशन
बेदी नाराज़ हैं कि
प्रधानमंत्री ने उनका भरोसा तोड़ दिया
बेदी नाराज़ हैं कि
इस तंत्र में अब काबिलियत की जरूरत नहीं
करनी होती है तिकड़म
चीख - चीख कर बार-बार बताना होता है कि
मैं भी हूँ कतार में ।
चैनल पर ये ख़बर दिन भर चलती रही मानो
बेदी कि लड़ाई का जिम्मा चैनलों ने उठा लिया।
शाम होते- होते उसी न्यूज़ रूम में बाँटीं गयी कुछ चिट्ठियां
बंद लिफाफों में
कुछ के चेहरे खिले तो
कुछ थे नाराज़ ,
अब बारी खबरें तानने वालों की थी
यहाँ भी तंत्र ने अपना कमाल दिखा दिया था
बस फर्क था तो इतना कि
सब कुछ ऑफ़ स्क्रीन था
हताशा , मायूसी और गुस्सा...
अब किसी बॉस को फिक्र नहीं थी
क्योंकि उन्हीं ने बाँटीं थीं रेवडी
आंकी थी काबिलियत ।
कुछ ने थोडी भड़ास निकाली
कुछ चले गए छुट्टी पर ।
लेकिन यहाँ कोई बेदी नहीं थी
कि चैनल पर बन जाती ख़बर
कि बेदी तीन महीने की छुट्टी पर
कि मच जाता हड़कंप
कि गृहमंत्री के साथ हो जाती मीटिंग
कि मिल जाती थोडी दिलासा ।
ये चैनल है
जहाँ चलती हैं खबरें
हमेशा यूँ ही दौड़ती -भागती
न्यूज़ रूम की खबरें
कब कुचल जाती हैं
या कुचल दी जाती हैं
पता नहीं .....

रविवार, 14 दिसंबर 2008

आक्रान्ताओं से

"मुंबई हमलों के बाद से ही सिस्टम से नाराज़ लोग अपनी हताशा और गुस्सा प्रकट कर रहे हैं। किसलय दिल्ली में सूचना प्रसारण मंत्रालय के फिल्मस डिवीजन में अपनी सेवाऐं दे रहे हैं।किसलय सीधे उनसे बात करने की कोशिश कर रहे हैं जिनके कानों तक कुरान की आयतें नहीं पहुंच पाती। यह कविता उन्होने सात साल पहले संसद में हमले के बाद लिखी थी, आज ये कविता फिर से मौजूं हो गयी है। "


तुम जो चाहते हो
इस पृथ्वी पर अकेले राज करना !
तो फोड़ते क्यों हो बम -
कभी- कभी
कहीं-कहीं
छिपकर पॉँच-एक ?
कुछ ऐसा फोड़ो-
एक ऐसी मिसाइल
या परमाणु बम,
जिससे बच न सके कोई भी,
सिवा तुम्हारे!
और फिर,
चढ़ जाना हिमाद्रि के
उत्तुंग शिखर पर ।
वहां नोच- नोच कर अपने बाल
नोच डालना अपने वस्त्र ;
और
जोर से चिल्लाना फिर
नंगा होकर।