शनिवार, 4 अप्रैल 2009

रंग में डूबे सियारों की होली


यह लेख आज जनसत्ता ने छापा है, आपसे सांझा कर रहा हूं।

हालिया फिल्म गुलाल का एक डायलाग है- गुलाल असली चेहरे को छुपा देता है।शायद बात सही भी है लेकिन गुलाल की रंगत भी कई बार चेहरे के पीछे के दूसरे रंग को नहीं छिपा पाती है। कुछ ऐसा ही देखने को मिला इस होली में, यह होली सर को झूका देने वाली थी, राजनीति के झंडाबरदारों की होली में बेशर्मी सर चढ़कर बोल रही थी। होली के काफी पहले ही कई नेताओं ने मुबंई हमलों के विरोध में या यूं कहे अफसोस जताने की विवशता में, होली ना खेलने का खुला चुनावी एलान कर दिया था। लेकिन वो नेता ही क्या जो शब्दों के रंग बिखेरना और उन्हे कूटनीति के तेल से मिटाना ना जानता हो। अब नेताजी ने मूंह से कह दिया था कि होली के दिन रंग अबीर नहीं उड़ेगा तो उन्होने होली के एक दिन पहले ही खुद को समर्थकों के साथ गुलाल से सराबोर कर लिया, आखिर वादें के मुताबिक अगले दिन उन्हे रंग गुलाल से दूरी बना कर रखनी थी,
वो कहते है ना कि काले रंग पर कोई रंग नहीं चढता भले ही उसे कितने ही चटक रंगो से क्यों ना छिपाया जाए, मुंबई हमलों के पीड़ित परिवारों को लेकर इन्हे कितना दुख है ये गुलाल में चेहरा छिपाने के वाबजूद सामने आ ही गया, कवरेज के लिहाज से सबसे पहले प्रधानमंत्री पद की प्रतिक्षा सूची में खड़े नेता के घर पहूंचा तो दरवाजे पर ही नोटिस लगा हुआ था, जिस पर लिखा था - मुंबई हमलों के पीड़ित परिवारों के दुख में शामिल होते हुए हमने होली ना मनाने का निर्णय लिया है। जाहिर है मीडिया के प्रवेश पर भी पाबंदी थी, कुछ देर उनके घर के बाहर खड़े रहे, पूर्व परिचित गार्ड ने बताया, साहब कुछ खास लोगो से ही गुलाल लगवा रहे है। थोड़ी देर में ही उसकी बात सच होती नजर आई कुछ खास गाडिया जिसमें गुलाल लगाए लोग बैठे थे, बंगले के अंदर जा रही थी, इन गाड़ियों में बैठे लोग वो सियार थे जो रंग से नहीं रंगत से अपने सियार दोस्त को पहचान लेते है।
बहरहाल कुछ देर तक यह नजारा देखने के बाद हम एक पार्टी के अध्यक्ष के निवास पर पहूंचे, यहां निराशा हाथ नहीं लगी क्योकि अध्यक्ष जी गुलाल में सराबोर सभी का स्वागत करने को तैयार बैठे मुस्करा रहे थे, ठोल के साथ होली खेले रघुवीरा .. की गूंज थी, शिव का भेष धर एक बच्चा अध्यक्ष जी के सामने नृत्य पेश कर रहा था और बीच -बीच में एक बटन की सहायता से उसकी जटाओं से निकलती गंगा की धार अध्यक्ष जी के पैरों पर पड़ कर खुद को कृताज्ञ महसूस कर रही थी। बालक शिव द्वारा बार - बार की जा रही इस लीला पर अध्यक्ष जी भाव विभोर हुए जा रहे थे। मुझे दिल्ली-6 का एक दृश्य याद आ गया जिसमें विधायिका के पहूंचने पर रामलीला को बीच में ही रोक दिया जाता है और राम लक्ष्मण हनुमान सभी माला पहना कर विधायिका का स्वागत करते है फिर शिव अपना तांडव भी पेश करते है, आवाज गूंजती है- भगवान भी कुर्सी का महत्व समझते है। बचपन में मेरे गांव सिहावल में रामलीला के मंचन के दौरान लोग राम लक्ष्मण बने कलाकारों के चरण छूते थे रामलील शुरु होने से पहले क्षेत्र के नेता आकर कलाकारों को माला पहनाते थे। गांव का वह रामलीला क्षेत्र हमारे लिए आस्था का मंदिर होता था आस्था आज भी है बस उसका दिशा परिवर्तन हो गया है, वैसे भी मौका परस्ती का ऊंठ हमेशा वक्त की करवट को देखकर रंग बदलता है। पहले होली पर बाबू जगजीत सिंह की बिलवरिया तान होली के रंग में वीर रस घोल देती थी, सुर और तान आज भी छेड़े जाते है लेकिन अब वीर रस की मांग कम है, वीर रस के बिलवरिया की जगह चापलूसी की चालीसा ने ले ली है। चुनाव के ठीक पहले आई इस होली में हर जगह इसी चालीसा की तान सुनाई दे रही थी, एक अन्य नेता को टिकिट के इच्छुक लोग लड्डूओं से तौल रहे थे, इस तौल मोल में कई सारे लड्ड़ूओं का चूरा बन जमीन पर गिर गया जिसे उठा कर वापस तराजू पर रख दिया गया, इसके बाद यहीं लड़डू वहां मौजूद लोगो को बांटे गए, लड्ड़ू देख कर ही लग रहा था कि वह खाने के लिए नहीं तौलने के लिए ही बनाए गए है,पर जोगीरा की तेज तान के बीच अपने नेता को खुश करने के लिए लोगो ने लड्डू मूंह में डाल भी लिए और उसकी मिठास का आनंद भी उठाया।
बहरहाल नेताओं की इस होली के नजारे यही खत्म नहीं हुए,होली पर जहां एक दूसरे के मुंह में गुछिया जबरदस्ती डाली जाती है वहीं प्रदेश स्तर के भगवा नेता के यहां गुछिया और कचौरी को चाकू से आधा-आधा काटकर पसोरा जा रहा था,उनके खासमखास मुस्कराते हुए स्टाल के पास खड़े भीड़ पर नजर रखे थे, एक ने संतो जैसी मुस्कराहट के साथ मेरी तरफ देखा , जिसका सीधा मतलब था खबरदार जो एक पीस से ज्यादा उठाया। संभवत कार्यकर्ताओं की बढ़ती भीड़ के कारण उन्हे ऐसा करना पड़ा होगा। खैर होली बीत गई और नेताओं ने अपने अपने मतलब का गुलाल भी पोता ना सिर्फ अपने चेहरे पर बल्कि हमारे आपके चेहरों पर भी।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

चांदनी चौक टू चाइना घोर संयोगो से भरा सफ़र






पंकज रामेन्दू आपको इस हफ्ते सीसी2सी यानी चांदनी चौक से चाइना की यात्रा करने से मना कर रहें हैं---


चांदनी चौक टू चाइना रिलीज़ होने से पहले अक्षय कुमार ने अपनी फिल्म के प्रमोशन के दौरान कहा था कि मेरी फिल्म को दिमाग से नहीं दिल से देखना। तकनीकी तौर पर तो दिल का सोचने में कोई भूमिका नहीं होती है लेकिन अगर हम अक्षय की बात को साहित्यिक नज़रिये से लेकर भी फिल्म को देखते हैं तो इस फिल्म को देखने के लिए दिल भी गवारा नहीं करेगा।
चांदनी चौक टू चाइना एक ऐसी फिल्म है जिसे देखते हुए आप लगेगा की आप किसी ठेले पर बिकने वाले उपन्यास को पढ़ रहे हैं जिसमें कहानी को आगे बढ़ाने के लिए घोर संयोगो का सहारा लिया जाता है। यहां तक भी रहता तो ठीक था लेकिन फिल्म में जिस तरह से अक्षय ने अपनी कॉमेडी का सहारा लिया वो ऐसा लगता है जैसे अक्षय को अब सिर्फ ये ही एक्टिंग आती है।
एक विदेशी फिल्म के अंदाज़ में शुरू हुई इस फिल्म की कहानी चाइना से शुरू होती है जहां एक लड़ाका ल्यू शैंग जो चाइना को बचाने के लिए हमेशा लड़ता रहता है कि लड़ाई के दौरान मौत हो जाती है और वहां एक गांव पर विलेन होजो का कब्ज़ा हो जाता है, होजो से गांव को बचाने के लिए गांववाले भगवान से प्रार्थना करते हैं और उन्हें मालूम चलता है कि ल्यू शैंग का इंडिया में पुनर्जन्म हुआ है, यहां से फिल्म में अक्षय यानि सिद्धू आते हैं जो कि चांदनी चौक टू चाइना के परांठा वाली गली में एक बावर्ची है औऱ मिथुन यानि दादा के ढाबे पर काम करता, सिद्धू एक ऐसा किरदार है जो मेहनत से ज्यादा किस्मत पर भरोसा करता है औऱ उसका दादा उसे हमेशा समझाता रहता है कि ज़िंदगी में जो होता है वो मेहनत होती है, सिद्धू की जिंदगी में एक और किरदार है वो हे ज्योतिष चॉपस्टिक यानि रणवीर शौरी। वो सिद्धू को बेवकूफ बनाता है औऱ चाइना से आए लोग जो अक्षय को ल्यू शैंग का पुनर्जन्म मानते हैं और उसे होजो का मारने के लिए चाइना ले जाना चाहते हैं उनकी इस बात को अक्षय से छुपा लेता है और ये बताता है कि वो चाइना का एक राजा है, अक्षय इस बात को मानते हुए चाइना जाने के लिए तैयार हो जाता है, इसी बीच एक औऱ किरदार है दीपिका जो एक कंपनी की मॉ़डल है, दीपिका का ही दूसरा रोल है जो चाइनीज़ लुक में दिखी है वो होजो के गैंग में शामिल है। ये दोनो दीपिका बहन है जो चाइनीज़ फादर औऱ इंडियन मदर की संताने है यहां फिर संयोग और दोनों बिछड़ जाती है, फिल्म के अंत में दोनो मिलती है, मिथुन को होजो मार देता है अक्षय को पूरी तरह तोड़ दिया जाता है, दीपिका के पिता अक्षय को मार्शल आर्ट सिखाते हैं, अक्षय यानि सिद्धू जो अपने दादा यानि मिथुन को दिलोजान से चाहता है उसकी मौत हो जाती है लेकिन पूरी फिल्म में अक्षय के चेहरे पर वो दर्द कहीं नज़र नहीं आता है, यहां तक कि मार्शल आर्ट सीखने के दौरान भी सिर्फ कॉमेडी बल्कि यूं कहें ज़बर्दस्ती की कॉमेडी को घुसाया गया है। अक्षय कुमार की कॉमेडी अब उबाने लगी है हर फिल्म में वो एक जैसे ही नज़र आते हैं, रणवीर शौरी जैसे परिपक्व कलाकार भी फिल्म में कुछ जान नहीं डाल पाये, मिथन चक्रवर्ती थोड़ा बहुत प्रभावित करते हैं और दीपिका पादुकोण भी अच्छी एक्टिंग कर गई है, हालांकि फिल्म में दीपिका के चाइनीज़ लुक की तारीफ करनी होगी, जिसमें वो वाकई में चाइनीज़ दिखती है, और अपनी एक्टिंग से दर्शकों को प्रभावित कर जाती है। कुल मिलाकर चांदनी चौक टू चाइना जैकी चैन की एक फिल्म रिवेन्ज की कॉपी लगती है, जिसे मनमोहन देसाई के मसाले के साथ पकाने की कोशिश की गई लेकिन फिल्म में स्क्रिप्ट की जो आंच थी वो सही तरह से नहीं पड़ सकी और कुल मिलाकर ये फिल्म जला हुआ खाना साबित होती है।

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

साल के पहले हफ्ते फिल्म रिलीज क्यों नहीं होती



"पंकज रामेंन्दू हर हफ्ते पुलिया पर फिल्म की समीक्षा लिखते है इस हफ्ते कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई तो पंकज बता रहे है ऐसा क्यों हुआ"





31 दिसंबर की रात के बाद जो अगली सुबह होती है वो बड़ी अजीब सी होती है थोड़ी अलसायी सी, थोड़ी शात और मुरझायी सी । पूरी दुनिया के साथ फिल्मी सितारें भी झूमते हैं लेकिन ये व्यापारिक झूमना होता है जिसके एवज़ में कुछ मिलता है। असंख्य शराब की बोतलों औऱ मुर्गे की टांगो के साथ साल की अलसायी शुरूआत होती है। इस साल आंतकी हमला हुआ और कुछ जानें चली गई तो सभी ने थोड़ा ग़मज़दा होकर पी। नया साल में हर बात नयी होती है सिर्फ एक बात को छोड़कर वो है थियेटर में लगी फिल्म, हर साल की तरह इस साल भी नये साल का शुक्रवार पुराना ही रहा। ये बॉलीवुड का बहुत पुराना विश्वास है या यूं कहिये की अंधविश्वास है कि साल का पहला हफ्ता अपशगुनी होता है इसलिए कोई भी डायरेक्टर इस हफ्ते अपनी फिल्म रिलीज़ नहीं करता। इस साल जो फिल्म रिलीज़ होंगी उनकी शुरूआत होगी 9 तारीख से यानि जनवरी के दूसरे शुक्रवार से, इस हफ्ते, काश मेरे होते, हॉर्न ओके प्लीज़, प्रेसिडेंट इज़ कमिंग जैसी फिल्में रिलीज़ होंगी। पिछले साल भी यही आलम था हल्ला बोल जैसी फिल्म साल के दूसरे हफ्ते में रिलीज़ हुई अब ये बात और है कि फिल्म फिर भी कुछ कमाल नहीं कर सकी। बॉलीवुड में विश्वास नाम की चीज़ नहीं होती है यहां स्क्रिप्ट चोरी होती है, यहां कलाकार,लेखक, निर्देशक सभी विश्वास करते हैं औऱ उनका विश्वास टूटता है कभी किसी का पैसा रुकता है तो कभी किसी को नहीं मिलता है, लेकिन इस ना विश्वास करने वाले मनोंरंजन उद्योग में अंधविश्वास भरपूर है। कभी कोई अपने सीरियल का नाम के अक्षर से रखता है तो कभी कोई अपनी फिल्म का नामों के अक्षर बढ़ाता है। सितारों के नामों का घालमेल तो आम बात है, इसी के चलते कभी चौराहे पर तोता लेकर बैठने वालों की चल पड़ी है औऱ अब वो सितारों का तोता बैठाते हैं। आंकड़ों के बाज़ीगर ये कहते हैं कि जनवरी के पहले हफ्ते रिलीज हुई फिल्म की नियति फ्लॉप होना ही है। पिछले पंद्रह सालों के आंकड़ो पर नज़र डालें तो साल 2007 में कुड़ियों का है ज़माना, आइ सी यू दोनों फिल्में साल की शुरूआती त्रासदी रही , 2006 में आई जवानी दिवानी और 15 पार्क एवेन्यू ये फिल्में भी पिट गई, 2005 में तीन मध्यम बजट की फिल्म रिलीज़ हुई जिसमें वादा, रोग, और यही है ज़िंदगी शामिल थी, रोग में विदेशी चमड़ी प्रदर्शन हुआ लेकिन थियेटर खाली रहे, इसके अलावा वासु भगनानी की वादा और यही हैं ज़िंदगी कब आई और गईं पता नहीं चला। 2004 में रिलीज़ हुई इश्क है तुमसे जिसने इन अंधविश्वासों को तोड़ा और फिल्म अच्छी चली। इसके अलावा 2003 में तलाश, 2002 में पिता, 2001 में गलियों का बादशाह, 2000 मे आई फिल्म जगत में अपने परफेक्शन के लिए पहचाने जाने वाले आमिर की मेला जिसमें उन्होंने अपने भाई फैज़ल को भी पर्दे पर उतारने की कोशिश की औऱ अनिल कपूर, रजनीकांत की बुलंदी दोनों ही फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धड़ाम से गिरी, आमिर का परफेक्शन और अनिल,रजनीकांत का इंप्रेशन भी कुछ कमाल नहीं कर सका। इसके पहले 1999 में सिकंदर सड़क का, 1997 में आस्था, 1996 में हिम्मत, जुर्माना, स्मगलर और 1994 मे आई आंसू बने अंगारे। इस फेहरिस्त पर अगर नज़र डाली जाए तो एक ख़ास बात सामने आती है कि पंद्रह साल में कोई ऐसी फिल्म रिलीज़ नहीं हुई जो हिट हो सकती थी यानि जिन फिल्मों को फ्लॉप होना था वो ही फ्लॉप हुई। या यूं भी कहा जा सकता है कि इन पंद्रह सालों में किसी ने अच्छी फिल्म रिलीज़ करने की हिम्मत ही नहीं जुटाई। धीरे धीरे ये विश्वास अमिट हो गया है कि जनवरी का पहला हफ्ता यानि फ्लॉप। स्कूल में एक कहानी पढ़ाई जाती है, कहानी का शीर्षक है धऱती फट गई। कहानी कुछ इस प्रकार है, एक खरगोश आम के पेड़ के नीचे सोया हुआ रहता है तभी उसे धड़ाम से आवाज़ आती है और वो दुम दबाकर भागता है औऱ साथ में चिल्लाता जाता है धरती फट गई, धरती फट गई, उसकी चिल्लाहट सुनकर औऱ जानवर भी उसके पीछे हो लेते हैं औऱ ये भागभभाग बढ़ती जाती है, तभी एक समझदार जानवर (वो कोई भी हो सकता है) जो संख्या मे कम हैं इसलिए सुने नहीं जाते हैं यही वजह हे कि वो चिल्ला का कर सभी जानवरों को रोकता है औऱ भागने की वजह पूछता है, कई जानवर एक स्वर में बोलते हैं धरती फट गई है तुम भी भागो, समझदार जानवर पूछता है कहां फटी और किसने देखा, उंगली उठते उठते खरगोश पर रुक जाती है वो भी दावे के साथ कहता है कि हां मैंने धड़ाम की आवाज़ सुनी जब मैं आम के पेड़ के नीचे सो रहा था। समझदार सभी को उस पेड़ के नीचे जाने के लिए कहता है कोई तैयार नहीं होता अंतत: वो खुद जाता है वहां पता चलता है कि एक बड़ा भारी आम गिरा पड़ा है, जिसकी आवाज़ ने खरगोश के मन में ये विश्वास जगा दिया था कि धरती फट गई है औऱ ये विश्वास कठोर होते होते अंधविश्वास में तब्दील हो जाता है। यही शायद बॉलीवुड के साथ है जहां विश्वास तो कायम नहीं है लेकिन अंधविश्वास फिल्म को रिलीज़ करने और ना करने या कब करने की बड़ी वजह है।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

मुर्गोदोस का डोज़

पंकज रामेन्दू उभरते हुए फिल्म पत्रकार है, लेकिन फिल्मी नहीं हैं। उनके लिखे शब्द ग्लैमर से दूर पूरी गंभीरता लिए हुए होते है। वे हमारे साथ अक्सर पुलिया पर बैठते है। अब से हर हफ्ते नई रिलीज फिल्म की समीक्षा पंकज पुलिया पर करेंगे। बाजार की किसी भी ताकत से अप्रभावित समीक्षा। इस हफ्ते गजनी





क्वांटिटी और क्वालिटी में क्या अंतर होता है ये बात किसी से अगर सीखी जा सकती है तो वो हैं आमिर ख़ान है, साल में एक बार आना औऱ छा जाना ये ही आमिर का परफेक्शन है।अमिताभ बच्चन एक फिल्म है अमर अकबर एंथनी, उसमें जब अमिताभ की लड़ाई विनोद खन्ना से होती है तो विनोद खन्ना उनकी खूब अच्छी धुनाई करते हैं, बाद में अमिताभ विनोद खन्ना को एक डायलॉग देते हैं, तुमने अपुन को इतना मारा अपुन ने तुम को दो मारा पन सॉलिड मारा ना। ये सॉलिड का डोज़ देना आमिर बहुत खूब जानते हैं। गजनी फिल्म के साथ भी ऐसा ही, ये फिल्म सिर्फ औऱ सिर्फ आमिर की फिल्म है। फिल्म में पहली बार आमिर ने अपने भावों का भरपूर प्रयोग किया है। फिल्म की कहानी शुरू होती है शॉर्ट टर्म मेमोरी के एक पेशेंट से जिसे हर 15 मिनिट बाद ये याद नहीं रहता है कि वो कौन है और क्या कर रहा है। अपनी याददाश्त को काबिज़ रखने के लिए वो अपने शरीर पर नं औऱ एड्रेस गोद लेता है, यही नहीं उसके घर में भी लोगों की तस्वीरें और नक्शे लगे रहते हैं जो उसे याद दिलाते हैं कि उसका अगला टास्क क्या है, फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है जब एक पुलिस इंसपेक्टर के हाथ में इस पेशेंट की लिखी हुई डायरी लगती है, जिससे मालूम चलता है कि पेशेंट का नाम संजय सिंघानिया है और वो एक बहुत बड़ी मौबाइल कंपनी का मालिक रहता है, एक संयोग से उसकी मुलाकात कल्पना (असिन) से होती है जो कि एक स्ट्रगलिंग मॉडल है, कुछ मुलाकात के बाद दोनों में प्यार हो जाता है लेकिन संजय कल्पना से अपनी आइडेंटिटि छुपा कर रखता है। कहानी तब नया मोड़ लेती है जब असिन एक बच्चो के अंग बेचने वाले ग्रुप का भांडाफोड़ करती है। वहीं से फिल्म में विलेन यानि गजनी धर्मात्मा (प्रदीप रावत) की एंट्री होती है। फिल्म में असिन के मर्डर का सीन बहुत ही अच्छा बन पड़ा है और लगता है कि डायरेक्टर जो डर पैदा करना चाहता था उसने वो कर दिखाया। असिन की एक्टिंग किसी किसी जगह बहुत ही लाजवाब नज़र आती है। हालांकि विलेन के तौर पर प्रदीप रावत बहुत ज्यादा इंप्रेस नहीं कर पाते हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स बेहतर बनाया गया है, लेकिन फिल्म में साउथ की फिल्मों का टच पूरी तरह नज़र आता है।अगर म्यूज़िक की बात करें तो फिल्म में गाने ज़बर्दस्ती डाले हुए लगते हैं, जो स्टोरी के हिसाब से कहीं भी फिट नहीं बैठते हैं हालांकि फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर काफी बेहतर है औऱ फिल्म की थीम को सपोर्ट करता है, गाने खूबसूरत हैं लेकिन फिल्म में जगह नहीं बना पाते हैं। फिल्म की स्टोरी कहीं लॉजिकल नहीं लगती है और फर्स्ट हॉफ बार बार दर्शकों को घड़ी देखने पर मजबूर कर देता है। फिल्म का स्क्रीनप्ले बार बार टूटता सा लगता है, लेकिन सेंकेंड हॉफ के बाद फिल्म स्पीड पकड़ती है, और स्टोरी पर अपनी ग्रिप बना लेती है।कुल मिलाकर अगर फिल्म की लेंग्थ थोड़ी छोटी होती तो फिल्म और भी बेहतर हो सकती थी। फिल्म में जिया खान का रोल काफी सीमित है और वो अपने उतने समय मे कोई ख़ास प्रभाव नहीं डाल पाती है, औऱ उन्हें अभी हिंदी पर काफी मेहनत करनी होगी। प्रसून की लिरिक्स औसत है, लेकिन रविचंद्रन की सिनेमोटोग्राफी कमाल की है। कुल मिलाकर आमिर की लाजवाब एक्टिंग के साथ ये एक औसत फिल्म है। जिसे एक बार देखा जा सकता है। इस फिल्म को 3 स्टार और आमिर की एक्टिंग पर जोरदार ताली

शनिवार, 20 दिसंबर 2008

एक ख़बर न्यूज़ रूम से



आपने पशुपति जी को पढ़ा, यूं ही ब्लाग की दुनियां में घूमते हुए उनके "खोयाचांद" ब्लाग पर यह कविता थी। यह सिर्फ कविता ही नहीं, मीडिया से जुड़े हर शक्स की आपबीती सी लगती है। पिछले साल लिखी गई इन लाइनों में घटना भले पुरानी हो, मर्म बारहमासी है। पशुपति जी वॉयस आफ इंडिया से जुड़े हैं।


किरण बेदी नाराज़ है
ख़बर आयी और न्यूज़ रूम में मच गयी हलचल
बॉस ने कहा - तान दो ख़बर
ख़बर तन गयी ...
बेदी नाराज़ हैं कि
उन्हें दिल्ली पुलिस प्रमुख नहीं बनाया गया
बेदी नाराज़ हैं कि
उनकी जगह किसी जूनियर को दिया गया प्रमोशन
बेदी नाराज़ हैं कि
प्रधानमंत्री ने उनका भरोसा तोड़ दिया
बेदी नाराज़ हैं कि
इस तंत्र में अब काबिलियत की जरूरत नहीं
करनी होती है तिकड़म
चीख - चीख कर बार-बार बताना होता है कि
मैं भी हूँ कतार में ।
चैनल पर ये ख़बर दिन भर चलती रही मानो
बेदी कि लड़ाई का जिम्मा चैनलों ने उठा लिया।
शाम होते- होते उसी न्यूज़ रूम में बाँटीं गयी कुछ चिट्ठियां
बंद लिफाफों में
कुछ के चेहरे खिले तो
कुछ थे नाराज़ ,
अब बारी खबरें तानने वालों की थी
यहाँ भी तंत्र ने अपना कमाल दिखा दिया था
बस फर्क था तो इतना कि
सब कुछ ऑफ़ स्क्रीन था
हताशा , मायूसी और गुस्सा...
अब किसी बॉस को फिक्र नहीं थी
क्योंकि उन्हीं ने बाँटीं थीं रेवडी
आंकी थी काबिलियत ।
कुछ ने थोडी भड़ास निकाली
कुछ चले गए छुट्टी पर ।
लेकिन यहाँ कोई बेदी नहीं थी
कि चैनल पर बन जाती ख़बर
कि बेदी तीन महीने की छुट्टी पर
कि मच जाता हड़कंप
कि गृहमंत्री के साथ हो जाती मीटिंग
कि मिल जाती थोडी दिलासा ।
ये चैनल है
जहाँ चलती हैं खबरें
हमेशा यूँ ही दौड़ती -भागती
न्यूज़ रूम की खबरें
कब कुचल जाती हैं
या कुचल दी जाती हैं
पता नहीं .....

गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

ना कागज़ की कश्ती, ना बारिश का पानी




मुबंई हमलों से ध्यान बटाने के सरकारी प्रयास शुरु हो चुके है, पहली कोशिश महाराष्ट्र सरकार ने की है। राज्य सरकार के श्रम मंत्रालय ने बालिका वधु, कृष्णा, उतरन जैसे कई सीरियलों को बच्चों से ज्यादा काम करवाने को लेकर नोटिस जारी किया है। महाराष्ट्र में बाल श्रमिकों की अच्छी खासी तादात है लेकिन मीडिया मोह के चलते सरकार को सेलीब्रिटी बच्चे ही नजर आए। लेकिन यहां हम महाराष्ट्र सरकार के इस नोटिस के बहाने बात करने की कोशिश कर रहे है कि किस तरह बाजार ने बचपन पर कब्जा कर लिया है। मां बाप इस बाजार के शिकार है, सबको अपना बच्चा नम्बर वन ही चाहिए टू नहीं। मेरा यह लेख जनसत्ता में 22 अक्टूबर को प्रकाशित हुआ था। इस नोटिस की आड़ में फिर आपसे सांझा कर रहा हूं।



टीवी पर मुंबई वर्ली से मटकी फोड़ का सीधा प्रसारण चल रहा था। गोविंदाओं ने घेरे बनाकर पिरामिड तैयार कर लिया था अंत में एक छोटे से बच्चे को कृष्ण का रुप धर सबसे ऊपर चढाने की कोशिश की जा रही थी। इतनी भी़ड़ हो हल्ला और ऊचाई देखकर बच्चा डर गया और जार जार रोने लगा। वहां मौजूद लाखों लोग वैसे ही उस तमाशे को देख रहे थे जैसे हम घर में बैठकर टीवी पर। टीवी कैमरा उस बच्चे पर फोकस किये हुए थे। सभी तमाशे का मजा ले रहे थे।हर कोई चाह रहा था बाल कृष्ण ऊपर तक पहुंच कर उन्हे दर्शन दे। चारों तरफ चीख चिल्लाहट का माहौल, कानफोड़ू माहौल में रिपोर्टर चीख-चीख कर ताज़ा जानकारी देने की कोशिश कर रही थी। इस मटकी फोड़ प्रतियोगिता में शामिल लोगो का घ्यान बच्चे से ज्यादा वहां लगे कारपोरेट बैनरों पर था जिन पर ईनाम की राशि लिखी थी। यही तो वो खास चीज थी जिसने बच्चे को इतनी ऊंचाई पर पहुंचा दिया था, मां बाप की इच्छा थी कि उनका बेटा और ऊंचा जाए, बच्चे को ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए उन्हें थोड़ी कुर्बानी तो देनी ही है, इसलिए वो बच्चे को रोने पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे। इसी बीच ब्रेक हो गया विज्ञापन आ रहा था - मां और दादी छोटे बच्चे को बोलना सीखा रहे है - मां बोल बैठा मां , कुछ देर बाद बच्चा मां के बजाए मनी कहता है यह विज्ञापन किसी वित्तीय फर्म का था। दूसरा विज्ञापन एक टूथपेस्ट का था जिसमें बच्चों से टीवी पर आने के लिए फोटो भेजने के लिए कहा जा रहा था। सोचने पर मजबूर हो गया कि बाज़ार ने बचपन को कैद कर लिया। हर चीज बाजार निर्धारित करने लगा है और बच्चों को बाजार चारे के रुप में इस्तेमाल कर रहा है।

आफिस जाने के लिए घर से बाहर निकला तो यही नजारा पास के स्कूल में देखने को मिला। जनमाष्टमी पर आयोजित कार्यक्रम में छोटे -छोटे बच्चों को कान्हा राधा बनाकर लाया गया था। हर अभिभावक चाहते थे कि उनका बच्चा ही वह तथाकथित विचित्र परिधान प्रतियोगिता जीते, उन्हे इस बात की जरा भी परवाह नहीं थी कि राधा बनी उनकी चार साल की बिटिया उस परिधान को संभाल भी नहीं पा रही। कोई बच्चा रो रहा है तो किसी द्वारिकाधीश का मुकूट उनकी आंखो पर आ रहा है। और अभिभावक उन्हे डांटकर यशोदा का नंदलाला बने रहने पर मजबूर कर रहे थे। कुल मिलाकर चारों ओर बाजारियत अभिभावको के सर चढ़कर बोल रही है। हालिया फिल्म तारे जमीन पर का तात्पर्य लोगो ने यह लगा लिया है कि हमारे बच्चो इस तेजी से बढ़ते प्रतियोगी समाज में हर हाल में तारे की तरह चमकना होगा।

हाल ही में एक रियल्टी शो में जजों ने एक प्रतियोगी बच्चे को इतनी जोर से ड़ांटा कि वह अपना होश ही खो बैठी। हर घर में बच्चे को दौड़ में आगे रहने के लिए डांटा फटकारा जा रहा है। मेरे परिचित का बेटा पढ़ाई लिखाई में औसत से भी नीचे है लेकिन नई कारों और मोबाईल के बारे में उसकी जानकारी गजब की है यह बाजार का असर ही है कि बच्चे अपनी स्वाभाविक ग्रोथ खोते जा रहे है।

गुजरात के नामी शिक्षाविद गिजुभाई वधेका ने खत्म होते इस बचपन को बहुत पहले पहचान कर बाल शिक्षा की अपनी किताब दिवास्वप्न में शांति का खेल खेलते हुए बताया कि ऊं शांति कह देने से ही बच्चे ध्यान करने नहीं बैठ जाते उनके अंदर जो ढेर सारी उर्जा होती है उसे वे खेल कूद कर, आपस में मस्ती कर निकालते है और यही से उनके स्वाभाविक विकास का मार्ग तय होता है।

बचपन में कभी भी पापा के द्वारा मारे गए उस झापड़ का बूरा नहीं लगा जो उन्होने हमेशा मेरी जेब में कंचे और चिये भरे रहने की वजह से मारा था। कभी पड़ोसी अंकल की खिड़की गिल्ली से तोड़ी तो उनकी डांट को भरपूर मजा भी उठाया। कंधो पर बस्ते के बोझ उठाता आज का बचपन शायद ये भूल गया कि आखिर मौज-मस्ती किस बला का नाम होता है। वीडियो गेम में आंखे गड़ाते बचपन शायद वो काग़ज की किश्ती और बारिश के पानी का आनंद उठाना जानता ही नहीं है, क्योंकि मां-बाप अपने लाड़ले में संस्कार डालना चाहते हैं और आज के संस्कार कहते हैं कि कंचे खेलता बचपन हल्का बचपन है, इसमें विकास जैसी कोई बात नहीं है, इससे भला तो ये है कि घर में बैठ कर इंटरनेट पर नज़र जमाओ, अपना होमवर्क करो, खाना खाओ और सो जाओ। हंसता बचपन, धूल मिट्टी से सना हुआ बचपन सिर्फ परेशानियों से घिरा हुआ हो गया है, लेकिन मेरी साड़ी से तेरी साड़ी सफेद कैसे ? के इस दौर में मां बाप भूल जाते हैं कि शिखर पर हमेशा एक ही होता है, जिसका ये कदापि मतलब नहीं है कि बाकि सब कुछ बेकार है। बाजार के इस प्रभाव से बाल सरंक्षण आयोग नहीं बच पाया है कुछ दिन पहले आयोग ने तय किया कि कामकाजी बच्चों के काम करने के घंटो की जांच की जाए,इस जांच के लिए आयोग ने रियल्टी शो और टीवी सीरियल मे काम करने वाले सिलीब्रेटी बच्चों को ही चुना, होटलो,ढाबो पटाखा चूड़ी कालीन कारखानों में काम करने वाले बच्चे आयोग को नजर नहीं आए।

मानिये या नामानिये पर हमारी पीडी का बचपन असल में बचपन था आज तो मां बाप बचपन को खत्म करने के लिए बचपना करने पर ऊतारु है। बचपन में किए गए कई कारनामें आज भी याद आते है चाहे पतंग उड़ाना हो या बेरी तोड्ने के लिए दूर तक जंगल में भटकना या फिर हॉकी के आकार की झाड़ी काटकर उससे हॉकी खेलना। हमेशा कामिक्स में डूबे रहना। जावेद अख्तर की लिखी लाइने"जब मेरे बचपन के दिन थे चांद में परिया रहती थी"आज के बचपन से मेल नहीं खाती पांचवी कक्षा किताब इस बहस से भरी पडी है कि चांद में जीवन की गुंजाईश है या नहीं । बाल कल्पनाओ को बाजार अपनी सुविधा से तोड़ मरोड़ रहा है। आज का बाजार उदय प्रकाश की कहानी अरेबा परेबा के उस बिलौटे की तरह है जो खरगोशो को खाकर एक नई कहानी गढ़ देता है कि खरगोशो को एलियंस ने पत्थर में बदल दिया। और बाल मन के पास बाजार की इस कहानी पर विश्वास करने के अलावा कोई चारा नहीं है।दरअसल आगे बढ़ाने की होड़ में बचपना कहीं पीछे छूट गया है, निदा फाजली जी ने शायद भविष्य देखकर ही ये बात लिखी होगी, बच्चों के नन्हे हाथों को चांद सितारे छूने दो, दो चार किताबे पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जाएंगे।

रविवार, 14 दिसंबर 2008

आक्रान्ताओं से

"मुंबई हमलों के बाद से ही सिस्टम से नाराज़ लोग अपनी हताशा और गुस्सा प्रकट कर रहे हैं। किसलय दिल्ली में सूचना प्रसारण मंत्रालय के फिल्मस डिवीजन में अपनी सेवाऐं दे रहे हैं।किसलय सीधे उनसे बात करने की कोशिश कर रहे हैं जिनके कानों तक कुरान की आयतें नहीं पहुंच पाती। यह कविता उन्होने सात साल पहले संसद में हमले के बाद लिखी थी, आज ये कविता फिर से मौजूं हो गयी है। "


तुम जो चाहते हो
इस पृथ्वी पर अकेले राज करना !
तो फोड़ते क्यों हो बम -
कभी- कभी
कहीं-कहीं
छिपकर पॉँच-एक ?
कुछ ऐसा फोड़ो-
एक ऐसी मिसाइल
या परमाणु बम,
जिससे बच न सके कोई भी,
सिवा तुम्हारे!
और फिर,
चढ़ जाना हिमाद्रि के
उत्तुंग शिखर पर ।
वहां नोच- नोच कर अपने बाल
नोच डालना अपने वस्त्र ;
और
जोर से चिल्लाना फिर
नंगा होकर।