शनिवार, 20 दिसंबर 2008

एक ख़बर न्यूज़ रूम से



आपने पशुपति जी को पढ़ा, यूं ही ब्लाग की दुनियां में घूमते हुए उनके "खोयाचांद" ब्लाग पर यह कविता थी। यह सिर्फ कविता ही नहीं, मीडिया से जुड़े हर शक्स की आपबीती सी लगती है। पिछले साल लिखी गई इन लाइनों में घटना भले पुरानी हो, मर्म बारहमासी है। पशुपति जी वॉयस आफ इंडिया से जुड़े हैं।


किरण बेदी नाराज़ है
ख़बर आयी और न्यूज़ रूम में मच गयी हलचल
बॉस ने कहा - तान दो ख़बर
ख़बर तन गयी ...
बेदी नाराज़ हैं कि
उन्हें दिल्ली पुलिस प्रमुख नहीं बनाया गया
बेदी नाराज़ हैं कि
उनकी जगह किसी जूनियर को दिया गया प्रमोशन
बेदी नाराज़ हैं कि
प्रधानमंत्री ने उनका भरोसा तोड़ दिया
बेदी नाराज़ हैं कि
इस तंत्र में अब काबिलियत की जरूरत नहीं
करनी होती है तिकड़म
चीख - चीख कर बार-बार बताना होता है कि
मैं भी हूँ कतार में ।
चैनल पर ये ख़बर दिन भर चलती रही मानो
बेदी कि लड़ाई का जिम्मा चैनलों ने उठा लिया।
शाम होते- होते उसी न्यूज़ रूम में बाँटीं गयी कुछ चिट्ठियां
बंद लिफाफों में
कुछ के चेहरे खिले तो
कुछ थे नाराज़ ,
अब बारी खबरें तानने वालों की थी
यहाँ भी तंत्र ने अपना कमाल दिखा दिया था
बस फर्क था तो इतना कि
सब कुछ ऑफ़ स्क्रीन था
हताशा , मायूसी और गुस्सा...
अब किसी बॉस को फिक्र नहीं थी
क्योंकि उन्हीं ने बाँटीं थीं रेवडी
आंकी थी काबिलियत ।
कुछ ने थोडी भड़ास निकाली
कुछ चले गए छुट्टी पर ।
लेकिन यहाँ कोई बेदी नहीं थी
कि चैनल पर बन जाती ख़बर
कि बेदी तीन महीने की छुट्टी पर
कि मच जाता हड़कंप
कि गृहमंत्री के साथ हो जाती मीटिंग
कि मिल जाती थोडी दिलासा ।
ये चैनल है
जहाँ चलती हैं खबरें
हमेशा यूँ ही दौड़ती -भागती
न्यूज़ रूम की खबरें
कब कुचल जाती हैं
या कुचल दी जाती हैं
पता नहीं .....

1 टिप्पणी: